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स्वतंत्रता के बाद कला संस्कृति में वैचारिक पक्षपात एवं मोदी सरकार में पारदर्शिता :

समृद्ध संस्कृति, कला और विरासत की भूमि है भारत जहाँ लोगों में इंसानियत, उदारता, एकता, धर्मनिर्पेक्षता, मजबूत सामाजिक संबंध और दूसरे अच्छे गुण हैं। दूसरे धर्मों के लोगों द्वारा ढ़ेर सारी क्रोधी क्रियाओं के बावजूद भी भारतीय हमेशा अपने दयालु और सौम्य व्यवहार के लिये जाने जाते हैं। अपने सिद्धांतों और विचारों में बिना किसी बदलाव के अपनी सेवा-भाव और शांत स्वाभाव के लिये भारतीयों की हमेशा तारीफ होती है। भारतीय संस्कृति की विशेषताओं पर बिन्दुवार कुछ बातें देखी जा सकती हैं। प्राचीनता - भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका में पाये गये शैलचित्र, नर्मदा घाटी में की गई खुदाई तथा कुछ अन्य नृवंशीय एवं पुरातत्त्वीय प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि भारत भूमि आदि मानव की प्राचीनतम कर्मभूमि रही है। सिन्धु घाटी की सभ्यता के विवरणों से भी प्रमाणित होता है कि आज से लगभग पाँच हज़ार वर्ष पहले उत्तरी भारत के बहुत बड़े भाग में एक उच्च कोटि की संस्कृति का विकास हो चुका था। इसी प्रकार वेदों में परिलक्षित भारतीय संस्कृति न केवल प्राचीनता का प्रमाण है...

आर्टिकल 35A और संविधान की किताब :

जिस अनुच्छेद 35A (कैपिटल ए) का जिक्र आजकल जम्मू-कश्मीर पर विमर्शों के दौरान हो रहा हैं, वह संविधान की किसी भी किताब में नहीं मिलता। जिस आर्टिकल की वजह से जम्मू-कश्मीर में लोग भारत का प्रधानमंत्री तो बन सकते हैं, लेकिन जिस राज्य में ये कई सालों से रह रहे हैं वहां के ग्राम प्रधान भी नहीं बन सकते : वह भारतीय संविधान का हिस्सा नहीं ? जिस 35A की वजह से लोग लोकसभा के चुनावों में तो वोट डाल सकते हैं लेकिन जम्मू कश्मीर में पंचायत से लेकर विधान सभा तक किसी भी चुनाव में इन्हें वोट डालने का अधिकार नहीं : वह 35A भारत के संविधान में कैसे नहीं ? हालांकि संविधान में अनुच्छेद 35a (स्मॉल ए) जरूर है, लेकिन इसका जम्मू-कश्मीर से कोई सीधा संबंध नहीं है।   इसका क्या मतलब ! क्या आर्टिकल 35A (कैपिटल) का वजूद नहीं ? क्या यह कोई संवैधानिक फरेब है ? भारतीय संविधान में आज तक जितने भी संशोधन हुए हैं, सबका जिक्र संविधान की किताबों में होता है। लेकिन 35A कहीं भी नज़र नहीं आता। दरअसल इसे संविधान के मुख्य भाग में नहीं बल्कि परिशिष्ट (अपेंडिक्स) में शामिल किया गया है। यह चालाकी इसलिए की ग...

उनके झूठ तैयार हैं, आप कितने तैयार हैं राष्ट्रवादियों !!

आपके राजनैतिक विरोधी अब यह मानने लगे हैं कि लगातार प्रधानमंत्री जी के नाम की आलोचना कर के उनसे गलती हुई है, वे नुकसान में रहे हैं... राष्ट्रवादी मित्रों। और अब विपक्ष ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए... सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों पर बात करने की तैयारी की है। जिसके नतीजे आपको जल्दी ही.. स्थापित मीडिया से लगायत सोशल मीडिया, सदनों, कार्यक्रमों, विभिन्न फोरमों, राजनीतिक पार्टियों के आयोजनों, दार्शनिक-वैचारिक-राजनैतिक गिरोहों आदि के मंचों से दिखेंगे। मैं विपक्ष की इस नीति का स्वागत करूंगा, लेकिन साथ ही आपकी जानकारी में लाना जरूरी समझूंगा कि ऐसा करते हुए ईमानदारी नहीं बरती जाएगी। गलत तथ्य रखे जाएंगे। झूठे आंकड़े प्रचारित किये जायेंगे। अफवाहें फैलाई जाएंगी। कुतर्क गढ़े जाएंगे.... आपके परधान मोदी जी का नाम लिए बिना। आपकी क्या तैयारी है मेरे सम्मानित राष्ट्रवादियों ? 'भाव' पर 'भाव' खाने से क्या सब हो जाने वाला है ! क्या आप भी खुद को शासन की नीतियों, कार्यक्रमों पर तथ्यों, आंकड़ों... के साथ तैयार रखने के बारे में सोचेंगे ? मुझे इस रणनीति के मुताबिक सामाजिक-राजनैतिक ...

आरक्षण पर आरक्षित विमर्श :

अवसर की समानता के लिए संवैधनिक व्यवस्था जातिगत आरक्षण एक बार फिर बहस के केंद्र में है, जबकि इसका कोई औचित्य नहीं बनता। औचित्य इस लिए नहीं, क्योंकि सरकार की तरफ से ऐसी कोई पहल अभी तक नहीं है। और अगर है भी... तो विरोध अथवा चिंता, शक, भ्रम का औचित्य इसलिए नहीं बनता क्योंकि दो बातें बिल्कुल साफ और सीधी हैं। - भाजपा (एनडीए) के लोकसभा 2014 घोषणापत्र में जातिगत आरक्षण की समाप्ति तो क्या, इसकी समीक्षा की भी कोई बात नहीं कही गयी है। इसलिए आरक्षण पर पार्टी के स्टैंड में कोई बदलाव आपेक्षित ही नहीं है। - वर्तमान केंद्र सरकार आरक्षण का दायरा प्रोन्नति (प्रमोशन) तक ले जाने की प्रक्रिया में कोई नई पहल नहीं करने जा रही : अगर वह इसे करने पर सहमति दिखा रही है तो भी। सरकार की मंशा क्या है ? सरकार चाहती है कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को "तय सीमा" तक आरक्षण का फायदा मिलना चाहिए। क्या है यह "तय सीमा" ? जातिगत आरक्षण में अनुसूचित जाति (एससी) के लिए 15% और अनुसूचित जाति (एसटी) के लिए 7.5% की सीमा तय है। आरक्षण की इस संवैधानिक व्यवस्था का अंतिम छोर तक ...

पूँजीवाद और समाजवाद का मिक्स नॉनवेज पुलाव : वामपंथ

मार्क्सवाद दरअसल जर्मन दार्शनिक हीगल के द्वंद्ववाद, इंग्लैंड के पूंजीवाद और फ्रांसीसी समाजवाद का "मिला-जुला नॉनवेज पुलाव" है। इसमें यूरोपीय सामंती भावना, सबसे उच्च होने का दंभ भी रहा है और भारत, भारतीयों के प्रति हीनभाव भी। यही वजह है कि वामपंथ भारत के स्वाभाविक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विरोधी है। ऐसा उसके मूल आयातित चरित्र के कारण जन्मना है। तो वहीं कांग्रेस... 1857 के गदर से सहमी कंपनी सरकार के ही अधिकारी ए ओ ह्यूम के हाथों अस्तित्व में आने और हितसाधन के बाद आगे.... तिलक, गांधी, विपिन चंद्र पाल, सरदार पटेल का नेतृत्व पाकर भी राष्ट्रवादी नहीं हो सकी। अपनी नियति के चलते वह आजादी के आंदोलन से राजनीतिक पार्टी और आगे चल कर एक खानदान की प्रॉपर्टी बन गई। कांग्रेस और वामपंथ चरित्र में एक हैं। भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म रूसी क्रांति की प्रेरणा से नवंबर 1925 में कांग्रेस अधिवेशन की छाया में हुआ था। भारत का कम्युनिस्ट आंदोलन कांग्रेस का बायां हाथ पकड़कर आगे बढ़ा। कांग्रेस ने उसे फलने-फूलने के अवसर दिए। भारतीय वामपंथ को सत्ता के छायावाद में पाले जाने की परंपरा और उनके स्...

महज एक कैम्पस भर बिसात वाले वामपंथ ने आखिर जेनयू में हराया किसको ?

बधाई हो कामरेड ! जेनयू में तेज चलती खिलाफत की आंधी में.... पेंग्विनों की तरह एक दूसरे के संग लिपट-चिपट के अस्तित्व रक्षा की जुगत करते हुए....सारे वाम फेडरेशनों ने गिरोह की शक्ल में एक होकर... चुनावों में आखिर हराया किसे है ? राष्ट्रवाद को या वाम द्वारा सर्वहारा समाज की पहचान दिए हुए दलित फेडरेशन.....बापसा (बिरसा-फूले-अम्बेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन) को ? सीटवार वोटों की संख्या देखिये और हर जगह बापसा को मिले मत देखिये। जेनयू में वाम ने दिखाया कि वह अब दलितों के मुक़ाबिल खड़ा है मैदान में। तो दलितों, वंचितों, आदिवासियों ने... वामपंथ की दूकान से अलग हो... खुद के स्वतंत्र अस्तित्व का निर्माण किया। रही बात एवीबीपी की, तो यह संगठन जेनयू छात्र राजनीति में अपनी सतत जगह बना रहा है जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता। चिंतन करिये इस ऐतिहासिक दुर्घटना पर : यह वाम दर्शन की जीत है या हार ? पढ़िये बापसा का जेनयू चुनावों में अध्यक्ष पद प्रत्याशी राहुल क्या कहता रहा अपनी कैम्पेनिंग में : आरक्षण से लेकर, हॉस्टल, स्वास्थ्य सुविधाएँ, गैर-अंग्रेजी माध्यम से आए छात्रों के साथ भेदभाव, वाइवा में वंचित समुदाय क...

तारिक फ़तेह ने जब बयान की सच्चाई तो झुंझलाए मुन्नवर राना ने यूँ खीझ मिटाई :

कल तारिक फतेह साहेब को एक टीवी शो की अदालत में बोलते हुए सुना और उस पर मुन्नवर राना साहेब का बतौर जज सुनाया फैसला भी। ठेठ पंजाबी मुस्लिम तारिक फतेह, जिन्हें मैं कुछ सालों से फॉलो करता और पढ़ता रहा हूँ.... जब यह खरा और नंगा सच सामने रख रहे हों कि : साहेब ! आपने पाकिस्तान बना के अलग किसे किया ? उन पंजाबियों, सिंधियों, बलूचियों और बंगालियों को..... जिनका इस्लाम एक मजहब के सिवाय..... उर्दू जुबां और संस्कृति से कोई वास्ता ही न रहा कभी ? "आँगन की चारपाई पर वो सूखती मिर्च छोड़ आए हैं".... जैसी भावपूर्ण लाइनें रचने वाले मुन्नवर साहेब.... भला तारिक साहेब के लिए और क्या कहते.... अगर लॉफ्टर के कलाकार न कहते तो ! ऐसा कहने के पीछे उनका जाती मामला है जिसका अंदाजा शायद नीचे आपको हो, जिसे मुझ जैसा अदना फेसबुकिया भी सालों से यहीं लिखता रहा है। बटवारे में रेडक्लिफ साहेब ने नक्शे में जो लाइनें खींच के हिस्सा किया उस हिस्से में दरअसल.... आबादी के लिहाज से बहुसंख्यक लेकिन सांस्कृतिक तौर पर एकदम अलहदा... वे मुसलमान आये जिन्होंने कभी जिन्ना के मुस्लिम लीग को आजादी के पहले के आम चुनावों में... ...